मन
मन मनुष्य के मैं को अर्थात खुद दर्शाता है | मन के दुवारा ही किसी भी बस्तु , तत्त या ज्ञान को जानना और उसको समझा जा सकता है |
मन एक खाली जगह या प्लेटफॉर्म है; जहां बिचार हर पल चलता रहता है | अगर बिचार ना हु तो ये स्थान शून्य ही शून्य है |मन मान लेता है किसी भी परिस्थिति को सच और झूठ की रूप में। इस तरह से मान्यता को मान लेना मन का काम है। मन केबल संकल्प और बिकल्प कर सकता है | ये एक प्रकार से मन के शक्ति है जिसकी बल पर मनुष्य कुछ भी साध सकता है |

मन शरीर का मुख्य कार्य प्रणाली में से प्रथम है | इसके दुवारा ही सारे क्रिया प्रतिक्रिया को क्रियान्वित किया जाता है | मन की उत्पति महतत्ब से अर्थात माया हुई है | प्रकृति अर्थात माया का सुष्म रूप ही मन है | इसलिए मन हमेशा प्रकृति अर्थात माया में लिपटता रहता है | मन की गति सबसे अधिक होता है ; इसमें भुत, बर्तमान और भविष्यत इन तीनो कालो में पल भर में आया जाया करता रहता है |
मन तीन भाग में बटा हुआ है |
चेतन मन, अवचेतन मन और अचेतन मन ।
चेतन मन जागृत अथवा चेतन अबस्था को कहा जाता है ; इस स्तर की स्थिति में मनुष्य सारे काम करता है जैसे की देखना , सुनना ,बोलना और सारे क्रिया प्रतिकिया ,जो कि दिन भर काम काज इत्यादी|
अवचेतन मन, जाग्रत और अचेतन अबस्था कि मध्य में जो स्तर आता है, उस पल या स्थिति को अवचेतन मन माना गया है। इस स्थिति में मनुष्य ना ठीक से जागृत हुता है ना पूरी तरह से नींद मे हुता है । कहा जाए तो नींद में जाने से पहले का समय। इस समय मे मन की जो स्तर हुता है उसे अवचेतन मन कहा गया है।
अचेतन मन यानी जो पूरी तरह से अचेत अबस्था मे हुता है । जब मनुष्य पूरी तरह से निद्रा में जाता है उसी अबस्था में मन को अचेतन मन माना गया है।
इन तीनो काल या अबस्था में से अचेतन अबस्था में मन की शाक्ति सबसे अधिक होता है। इस अबस्था में प्रबेश करने से ठीक पहले जो भी उचित संकल्प लिया जाए तो उसे बास्तविक जीबन लाया जा सकता है। ये उसकी मन की सुद्धता और पवित्रता पर निर्भर करेगा कि कितनी जल्दी बास्तविक हो। इस पद्दति को युग निद्रा कहा गया है।
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