Saturday, 15 August 2020

तंत्र

 तंत्र


तंत्र एक प्राचीन विधि है शरीर को रक्षा करने की। तंत्र दो सब्दो की सं मिश्रण से बना है। तन अर्थात शरीर , त्र अर्थात त्रान यानी रक्षा । तंत्र भौतिक जगत के बस्तुउ से समंध रखता है।  इसकी आधार पर भौतिक और पदार्थ बिशेष दिखाई पड़ता है।  प्राचीन काल में बेद से उपनिषध की और इसकी बाद पुराण की उद्वभ हुई थी।  ठीक इसकी बाद ही तंत्र ज्ञान की भी उद्वभ हुवा था। तंत्र साधना योग साधना से लेकर मोक्ष प्राप्ति तक फैला हुआ है। तंत्र शास्त्र की रचेईता महादेव को माना गया है। सभी तंत्र साधक किसी ना किसी रूप में भगवान शिव को ही तंत्र साधना के आराध्य मानते है। 


जंत्र या तंत्र साधना अकसर भौतिक सुख प्राप्ति हेतु किया गया दिखाई देता है।  इसकी फलसरूप मनष्य के मन  में इसकी प्रति डर भाब बनकर रह गयी है। हालाकि जंत्र या तंत्र और मंत्र साधना से मनुष्य ध्वनि,प्रकाश,वायू,जल,प्रकृति सभी प्रकार के इच्छाएं को पूरा कर सकता है। तंत्र साधना में उसकी नियम और मंत्र की बीज मंत्र , चित्र , बहुत सी रकम के जरी-बूटी (ऒसघी), और बहुत सी प्रकार के पदार्थ की जरुरत होती है। कहा जाये तो तंत्र ज्ञान रसायन बिज्ञान और आयुर्बेद की संमिश्रण ज्ञान है। 

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