मंत्र
मंत्र मन से निकला हुआ ध्वनि और प्रतिघ्वनि को कहा गया है । किसी खास सव्द को मन ही मन मार्जन करने से जो ध्वनि और प्रतिघ्वनि का उत्पन्न होता है उसी कि समूह को कहा गया है। मंत्र किसी खास सब्द की समूह से गठन किया गया है जो की पहले से इस सृजन में था। इसी को दैविक ज्ञान प्राप्त करने वाले ऋ्सि मूनिउ ने अपने दिव्य द्रृस्टि से देखकर संगठित किया हुआ है।
और आज भी बहुत सी मंत्र इस ब्रमांड अदृश्य होकर है। जो की अभी भी मनुष्य नहीं जान पाया है। और पहले से अच्छा लिपिबद्ध ना होने कारन बहुत लुप्त हु चूका है। कुछ ऐसे मंत्र को छुपाया गया आदि काल से जो की अच्छा और बुरा भी किया जा सकता है। मंत्र मनष्य के मन कि सबसे बड़ी विज्ञान है ; परन्तु मनष्य इसी को समझ ने में असमर्थ है। कोई कोई इसी रहश्य को जान पाता है और अपनी अध्याम्तिक उन्नति कर पाता है। मंत्र के शक्त्ति से मनष्य के मन में मनन करके कोई भी उद्द्श्य को पूरा किया जा सकता है। कहा जाये तो कुछ सब्दो को बार बार मन में बोलने से जो ध्वनि या लहर बनता है। जो ध्वनि या लहर इस पुरे प्रकृति और ब्रमांड को प्रभाबित करता है और बोलने बाले कि उद्द्श्य को पूरा करता है उसी को मंत्र कहा गया है।
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